Happy Diwali Wishes in Hindi | क्यों मनाया जाता है दिवाली का पर्व

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दिवाली का चौथा दिन है गोवर्धन पुजा

 Govardhan Puja 2020

धामों में धाम श्री मथुरा धाम जो इस संपूर्ण पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ है परंतु वृंदावन के आंतरिक वन मथुरा से भी श्रेष्ठ माने जाते हैं | किंतु इन वनों से भी श्रेष्ठ है गोवर्धन पर्वत कृष्ण ने इसे ब्रज वासियों की रक्षा करने के लिए अपने कमल सदृश्य सुंदर हाथ से छाती की भांति उठा लिया था |

गोवर्धन पर्वत पर ही कृष्ण अपने गोपमित्रों के साथ गाय चराते थे, और वहीं पर अपनी प्रियतमा श्रीमती राधा से मिला करते थे और उनके साथ प्रेम कहते हैं |

यूँ तो ब्रज में बहुत से पर्वत है, वे सब हरिदास है और उनमे भी लीलाए होती रहती है लेकिन गिरिराज जी हरिदास वर्य है | सबसे श्रेष्ठ है हरी यानि भगवान श्रीकृष्ण या भगवान श्री विष्णु तथा श्रीपाद सनातन गोस्वामी लिखते है

पापं दुखम चित्तं च यथा यथम हर किती हरि

अर्थात भगवान पाप, दुःख और चित्त को हरते है इसलिये उन्हें हरि कहते है | उन्ही हरि का व्यवहार है भक्तवत्सलता तथा जो उनके सरन में रहते ही उन्हें ही हरिदास कहते है अर्थात वे भी पाप, दुःख और चित्त को हरते है |

इस सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में भगवान श्रीहरि के जो दास है उन दासों में ये पर्वत गिरिराज जी ही सर्वश्रेष्ठ दास हरिदास है |

Govardhan Puja Images

govardhan puja images
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Govardhan Puja Time
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गोवर्धन पुजा से जुड़ी पौराणिक कथा

दिवाली के अगले दिन गिरिराज अर्थात गोवर्धन पर्वत की पुजा की जाती है | गोवर्धन पुजा के के संबंध में ये लोककथा प्रचलित है की इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र का घमंड तोड़ा था और इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए एक लीला रची |

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एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने देखा की सभी ब्रज वासी देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए उनकी भव्य पुजा की व्यवस्था कर रहे है, तभी कृष्ण ने अपनी मैया यसोदा से पूछा की वो सब किसकी पुजा की व्यवस्था कर रहे है |

इसपर मैया ने बताया की वो सब इंद्र की पूजा की तयारी कर रहे है क्यूंकि इंद जी वर्षा करते है जिससे अन्न पैदा होता है जिससे हमें खाने के लिए अन्न और गायों को चारा मिलता है | तभी कृष्ण भगवान ने बोला फिर तो हमे गोवर्धन पर्वत अर्थात गिरिराज जी की पुजा करनी चाहिए |

क्यूंकि वो हमें खाने के लिए मीठे मीठे फल और हमारे गायों के लिए हरी हरी घास देते है और हमारी गाय वही जाकर चारा चरती है, और वही इंद्र तो हमें कभी दर्शन नहीं देते और अगर उनकी पुजा न करो तो क्रोधित भी हो जाते है तो फिर ऐसे अहंकारी की पुजा करने से क्या फायदा |

तभी सभी ब्रजवासी ने श्री कृष्ण की बात मान ली और सभी देवराज इंद्र की बजाय गोवर्धन गिरिराज जी की पुजा करने लगे | जब ये बात देवराज इंद्र को पता चली तो बहुत क्रोधित हुए और अपने क्रोध और अहंकार में चूर इंद्र ने मुसलाधार बारिश शुरू कर दी और पुरे ब्रज को जल मग्न कर दिया |

ब्रजवासी अपनी जान बचाने के लिए भगवान से प्राथना करने लगे तभी भगवान श्री कृष्ण ने ब्रजवासी को बचाने के लिये पुरे गोवर्धन पर्वत को ही अपनी छोटी उंगली में उठा दिया | इधर इंद्र ने अपनी रौद्र रूप देखते हुए और तेज बारिश करना शुरू कर दिया और लगातार सात दिन तक तेज बारिश करते रहे |

वही भगवान श्री कृष्ण सम्पूर्ण ब्रिजवासी को उसी गोवर्धन पर्वत के निचे छाता बनाकर बचाते रहे | भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ब्रजवासी को बारिश का थोड़ा भी प्रभाव न पड़ा |

तभी ब्रम्हा जी ने इंद्र को बताया की पृथ्वीलोक में भगवान श्री विष्णु ने ही श्री कृष्ण का रूप धारण करके जन्म लिए है और तुम उन्ही से लड़ रहे हो | जब इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वो बहुत पछताए और भगवान कृष्ण की चरणों में जाकर गिर गये और क्षमा याचनाये करने लगे |

इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की शुरुवात हो गई और गोवर्धन की पुजा की जाने लगी | इस दिन गय, बैल को स्नान करा कर उन्हें सजाया जाता है तथा गाय के गोबर से ही गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है जिसकी पुजा कर उसकी परिक्रमा की जाती है |

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साथ ही इस दिन घरों में पकवान भी बनाये जाते है और इस पकवान को सबसे पहले गाय को खिलाया जाता है फिर उनके जूठे को प्रसाद के रूप में सभी को दिया जाता है ऐसी मान्यता है की जो भी व्यक्ति इस दिन गोवर्धन की परिक्रमा कर गाय के जूठे वाले प्रसाद को ग्रहण करता है उसपर श्री कृष्ण की विशेष कृपा बनी रहती है |


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