Short Story With Moral – Statue Maker

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Hello दोस्तों आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है आपके अपने Story In Hindi वेबसाइट में आज की कहानी Short Story With Moral – Statue Maker एक शिक्षाप्रद कहानी है जो हमें अपने लक्ष्य को निर्धारित करने तथा उसमे बने रहने और सफलता प्राप्त करने के बारे मे बताती है |

ये कहानी हमें तेजस्विनी निषाद ने भेजी है वो बताती है की वो हमारी रेगुलर रीडर है और उन्हें हमारी वेबसाइट में स्टोरी पढना बहुत पसंद है | हमारी पूरी Story In Hindi की टीम उनकी इस कहानी के लिये उनका धन्यवाद करती है |

चलिये दोस्तों Short Story With Moral – Statue Maker कहानी की शुरुवात करते है |


Short Story With Moral – Statue Maker

एक गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था वो काफी खूबसूरत मूर्तियां बनाया करता था और इस काम से वह अच्छा कमा लेता था |

उसे एक बेटा हुआ उस बच्चे ने बचपन से ही मूर्तियां बनानी शुरू कर दी बेटा भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था और पिता अपने बेटे की कामयाबी पर खुश होता था | लेकिन हर बार बेटे की मूर्तियों में कोई ना कोई कमी निकाल दिया करता था |

वो कहता था बहुत अच्छा किया है लेकिन अगली बार इस कमी को दूर करने की कोशिश करना | बेटा भी कोई शिकायत नहीं करता था अपने पिता की सलाह पर अमल करते हुए अपनी मूर्तियों को और बेहतर करता रहा | और इस लगातार सुधार की वजह से बेटे की मूर्तियां पिता से भी अच्छी बनने लगी |

और ऐसा टाइम भी आ गया कि लोग बेटे की मूर्तियों को बहुत पैसा देकर खरीदने लगे जबकि पिता की मूर्तियां उसकी पहली वाली कीमत पर ही बिकती रही |

पिता अब भी बेटे की मूर्तियों में कमियां निकाल ही देता था लेकिन बेटे को अब अच्छा नहीं लगता था | और वो बिना मन के उन कमियों का एक्सेप्ट करता था लेकिन फिर भी अपनी मूर्तियों में सुधार कर ही देता था |

एक टाइम ऐसा भी आया कि जब बेटे के सब्र ने जवाब दे दिया पिता जब कमियां निकाल रहा था तो बेटा बोला आप तो ऐसे कहते हैं कि आप जैसे बहुत बड़े मूर्तिकार है अगर आपको इतनी ही समझ होती तो आप की मूर्तियां कम कीमत में नहीं बिकती | मुझे नहीं लगता कि आपकी सलाह लेने की मुझे जरूरत है मेरी मूर्तियां पर्फेक्ट है |

पिता ने बेटे की बात सुनी तो उसने बेटे को सलाह देना और उसकी मूर्तियों में कमियां निकालना बंद कर दिया | कुछ महीने तो वह लड़का खुश रहा लेकिन फिर उसने नोटिस किया कि लोग अब उसकी मूर्तियों की इतनी तारीफ नहीं करते जितनी पहले किया करते थे और उसकी मूर्तियों का दाम बढ़ना भी बंद हो गया था |

शुरू में तो बेटे को कुछ समझ नहीं आया लेकिन फिर वह अपने पिता के पास गया और उसे समस्या के बारे में बताया पिता ने बेटे को बहुत शांति से सुना जैसे की उसे पहले से पता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा |

बेटे ने भी इस बात को नोटिस किया और उसने पूछा क्या आप जानते थे कि ऐसा होने वाला है ? पिता ने कहा हां क्योंकि आज से कई साल पहले मैं भी इस हालात से टकराया था |

बेटे ने सवाल किया तो फिर आपने मुझे समझाया क्यों नहीं ? पिता ने जवाब दिया क्योंकि तुम समझना नहीं चाहते थे मैं जानता हूं कि तुम्हारे जितनी अच्छी मूर्तियां मैं नहीं बनाता यह भी हो सकता है कि मूर्तियों के बारे में मेरी सलाह गलत हो और ऐसा भी नहीं है कि मेरी सलाह की वजह से कभी तुम्हारी मूर्ति बेहतर बनी हो |

लेकिन जब मैं तुम्हारी मूर्तियों में कमियां दिखाता था तब तुम अपनी बनाई मूर्तियों से संतुष्ट नहीं होते थे | तुम खुद को बेहतर करने की कोशिश करते थे और वही बेहतर होने की कोशिश तुम्हारी कामयाबी का कारण था |

लेकिन जिस दिन तुम अपने काम से संतुष्ट हो गए और तुमने यह भी मान लिया कि अब इसमे और बेहतर होने की गुंजाइश ही नहीं है तो तुम्हारी ग्रोथ भी रुक गई | लोग हमेशा तुमसे बेहतर की उम्मीद रखते और यही कारण है कि अब तुम्हारी मूर्तियों के लिए तुम्हारी तारीफ नहीं होती ना ही उनके लिए तुम्हें ज्यादा पैसे मिलते हैं |

बेटा थोड़ी देर चुप रहा फिर दिल से सवाल किया, तो अब मुझे क्या करना चाहिए ? पिता ने एक लाइन में जवाब दिया असंतुष्ट (अनसेटिस्फाई) होना सीख लो मान लो कि तुम में हमेशा बेहतर होने की गुंजाइश बाकी है यही एक बात तुम्हें हमेशा आगे बेहतर होने के लिए इंस्पायर्ड करती रहेगी और तुम्हें हमेशा बेहतर बनाती रहेगी |


 

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